पारंपरिक भारतीय शिल्पों के लिए नए जीआई टैग
2026-09-25पृष्ठभूमि: भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग गुणवत्ता और विशिष्टता का एक प्रतीक हैं जो भौगोलिक रूप से किसी उत्पाद से जुड़ा होता है। भारत में अद्वितीय हस्तशिल्प की एक समृद्ध परंपरा है। वर्तमान संदर्भ: 25 सितंबर 2026 तक के पिछले कुछ दिनों में, भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री ने हिमाचल प्रदेश की जटिल लकड़ी की नक्काशी और ओडिशा की हाथ से बुनी रेशम की साड़ियों सहित पारंपरिक भारतीय शिल्पों के लिए कई नए जीआई टैग को मंजूरी दी है। इन स्वीकृतियों का उद्देश्य कारीगरों की प्रामाणिकता और आर्थिक हितों की रक्षा करना है। प्रभाव: जीआई टैग प्रदान करने से इन शिल्पों की विपणन क्षमता बढ़ेगी, नकल के खिलाफ कानूनी सुरक्षा मिलेगी, और कारीगरों को उचित मूल्य और उनकी अनूठी कौशल और विरासत के लिए व्यापक पहचान सुनिश्चित करके सशक्त बनाया जाएगा।
प्राचीन पांडुलिपियों के डिजिटल पुरालेखन की पहल
2026-09-25पृष्ठभूमि: भारत में विभिन्न भाषाओं में प्राचीन पांडुलिपियों का एक विशाल संग्रह है, जिसमें अमूल्य ऐतिहासिक और सांस्कृतिक ज्ञान निहित है। इनमें से कई नाजुक हैं और क्षरण के जोखिम में हैं। वर्तमान संदर्भ: 25 सितंबर 2026 तक, संस्कृति मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन ने अपनी डिजिटल पुरालेखन पहल में तेजी लाई है। देश भर के संस्थानों से दुर्लभ संस्कृत, तमिल और प्राकृत पांडुलिपियों के डिजिटलीकरण में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, जिससे उनके संरक्षण और पहुंच सुनिश्चित हो सके। प्रभाव: यह पहल अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को भौतिक क्षय और हानि से बचाती है। यह भारत की प्राचीन ज्ञान प्रणालियों में गहरी समझ और अनुसंधान को बढ़ावा देते हुए दुनिया भर के शोधकर्ताओं, विद्वानों और आम जनता के लिए ऐतिहासिक ग्रंथों तक पहुंच को भी लोकतांत्रिक बनाती है।