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पर्यावरण और पारिस्थितिकी समसामयिकी: तटीय बहाली, ग्लेशियर पिघलना, प्लास्टिक नीति

भारत ने 'तटीय लचीलापन और पारिस्थितिकी तंत्र बहाली मिशन' (CREM) का शुभारंभ किया
2026-07-03
पृष्ठभूमि: भारत की विस्तृत तटरेखा समुद्र-स्तर में वृद्धि और चरम मौसमी घटनाओं जैसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है, जिससे मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियों जैसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र खतरे में हैं। ये आवास महत्वपूर्ण पारिस्थितिक सेवाएं प्रदान करते हैं और तटीय समुदायों की रक्षा करते हैं। वर्तमान संदर्भ: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 'तटीय लचीलापन और पारिस्थितिकी तंत्र बहाली मिशन' (CREM) का शुभारंभ किया है। इस महत्वाकांक्षी पहल का लक्ष्य 2030 तक 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 5,000 वर्ग किमी के खराब हो चुके तटीय आवासों को बहाल करना है, जिसके प्रारंभिक पायलट प्रोजेक्ट इस महीने शुरू हो रहे हैं। प्रभाव: CREM तटीय जैव विविधता को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाएगा, जलवायु परिवर्तन के खिलाफ प्राकृतिक सुरक्षा में सुधार करेगा और स्थानीय मछली पकड़ने वाले समुदायों की आजीविका का समर्थन करेगा। यह वैश्विक जलवायु कार्रवाई और सतत विकास लक्ष्यों के प्रति भारत की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है।
रिपोर्ट में हिमालयी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने पर प्रकाश डाला गया, जल सुरक्षा को खतरा
2026-07-03
पृष्ठभूमि: हिमालय, जिसे अक्सर 'एशिया का जल मीनार' कहा जाता है, प्रमुख नदियों का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो अरबों लोगों का भरण-पोषण करता है। हालांकि, ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियरों के पिघलने की दर में वृद्धि हुई है, जिससे क्षेत्रीय जल संसाधनों पर असर पड़ रहा है। वर्तमान संदर्भ: नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ग्लेशियोलॉजी की एक हालिया रिपोर्ट में हिमालयी ग्लेशियरों के पिघलने में खतरनाक तेजी का खुलासा हुआ है, जिसमें कुछ क्षेत्रों में पिछले दशक में पिघलने की दरों में 15% की वृद्धि देखी गई है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि यदि वर्तमान रुझान जारी रहे तो 2050 तक निचले इलाकों की आबादी के लिए महत्वपूर्ण जल संकट का खतरा होगा, जिससे तत्काल अनुकूलन और शमन रणनीतियों का आग्रह किया गया है। प्रभाव: यह त्वरित पिघलाव कृषि उत्पादकता, जलविद्युत उत्पादन के लिए गंभीर खतरा पैदा करता है, और बाढ़ तथा सूखे के जोखिम को बढ़ाता है। यह क्षेत्र में दीर्घकालिक जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सीमा पार सहयोग और मजबूत जल प्रबंधन नीतियों को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल देता है।
भारत ने 'प्लास्टिक के लिए राष्ट्रीय चक्रीय अर्थव्यवस्था नीति 2026' का अनावरण किया
2026-07-03
पृष्ठभूमि: भारत एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक पर मौजूदा प्रतिबंधों के बावजूद, प्लास्टिक कचरा प्रबंधन की बढ़ती चुनौती का सामना कर रहा है। 'लेना-बनाना-निपटाना' का रैखिक मॉडल पर्यावरणीय प्रदूषण और संसाधन क्षरण में महत्वपूर्ण योगदान देता है। वर्तमान संदर्भ: पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 'प्लास्टिक के लिए राष्ट्रीय चक्रीय अर्थव्यवस्था नीति 2026' पेश की है। यह व्यापक नीति विस्तारित उत्पादक जिम्मेदारी (EPR) पर जोर देती है, अभिनव रीसाइक्लिंग प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देती है, और नए प्लास्टिक की खपत को कम करने के लिए सामग्री प्रतिस्थापन को प्रोत्साहित करती है। शहरी अपशिष्ट धाराओं और औद्योगिक प्लास्टिक रीसाइक्लिंग पर केंद्रित पायलट परियोजनाएं प्रमुख शहरों में शुरू की गई हैं। प्रभाव: इस नीति का उद्देश्य प्लास्टिक प्रदूषण को नाटकीय रूप से कम करना, एक मजबूत रीसाइक्लिंग बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देना और चक्रीय अर्थव्यवस्था ढांचे के भीतर हरित रोजगार पैदा करना है। यह संसाधन दक्षता प्राप्त करने और राष्ट्रीय अपशिष्ट न्यूनीकरण लक्ष्यों को पूरा करने, सतत उपभोग और उत्पादन पैटर्न को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
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