आरबीआई ने रेपो दर में यथास्थिति बनाए रखी, मुद्रास्फीति की चिंताओं में कमी
2026-08-10पृष्ठभूमि: भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) मुद्रास्फीति के रुझानों और आर्थिक विकास संकेतकों की बारीकी से निगरानी कर रहा है। पिछली नीति समीक्षाओं में मूल्य स्थिरता को बनाए रखने के साथ-साथ आर्थिक सुधार का समर्थन करने पर ध्यान केंद्रित किया गया था। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताएं और घरेलू मांग की गतिशीलता मौद्रिक नीति निर्णयों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक रहे हैं। वर्तमान संदर्भ: 10 अगस्त, 2026 को, आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने अपनी नवीनतम द्वि-मासिक समीक्षा की घोषणा की, जिसमें बेंचमार्क रेपो दर को 6.5% पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया गया। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब खुदरा मुद्रास्फीति में कमी के संकेत दिख रहे हैं, जो केंद्रीय बैंक के लक्ष्य सीमा के करीब आ रही है, जबकि आर्थिक वृद्धि मजबूत बनी हुई है। प्रभाव: यथास्थिति बनाए रखने से वित्तीय बाजारों को स्थिरता मिलने और चल रहे आर्थिक विस्तार को समर्थन मिलने की उम्मीद है। व्यवसायों को अनुमानित उधार लागत से लाभ होगा, जिससे निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा। हालांकि, आरबीआई ने भविष्य के नीतिगत समायोजनों के लिए, विशेष रूप से वैश्विक वस्तु कीमतों और मानसून के प्रदर्शन पर, उभरती आर्थिक स्थितियों की सतर्कता से निगरानी करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।
जून 2026 में भारत के औद्योगिक उत्पादन में मजबूत वृद्धि दर्ज
2026-08-10पृष्ठभूमि: औद्योगिक उत्पादन आर्थिक स्वास्थ्य का एक प्रमुख संकेतक है, जो विनिर्माण, खनन और बिजली क्षेत्रों में गतिविधियों को दर्शाता है। 'मेक इन इंडिया' और उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं जैसी हालिया सरकारी पहलों का उद्देश्य घरेलू विनिर्माण और निर्यात को बढ़ावा देना रहा है। वर्तमान संदर्भ: राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) द्वारा 10 अगस्त, 2026 को जारी आंकड़ों से पता चला है कि जून 2026 में भारत के औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आईआईपी) में 7.2% की वृद्धि हुई। यह मजबूत प्रदर्शन मुख्य रूप से विनिर्माण क्षेत्र में, विशेष रूप से पूंजीगत वस्तुओं और बुनियादी ढांचे से संबंधित उद्योगों में मजबूत वृद्धि से प्रेरित था, जो निरंतर आर्थिक गति को दर्शाता है। प्रभाव: सकारात्मक आईआईपी आंकड़े औद्योगिक गतिविधि में स्वस्थ सुधार और विस्तार का संकेत देते हैं, जो समग्र जीडीपी वृद्धि में योगदान करते हैं। इस प्रवृत्ति से आगे घरेलू और विदेशी निवेश आकर्षित होने, रोजगार के अवसर पैदा होने और वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में भारत की स्थिति मजबूत होने की उम्मीद है। नीतिगत ध्यान संभवतः व्यापार नियमों को आसान बनाने और बुनियादी ढांचे को बढ़ाने पर जारी रहेगा।