पारंपरिक शिल्पों के लिए नए जीआई टैग आवेदन क्षेत्रीय कलात्मकता को उजागर करते हैं
2026-07-27पृष्ठभूमि: भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग बौद्धिक संपदा अधिकार का एक रूप है जो किसी वस्तु को एक विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति के रूप में पहचानता है और उस उत्पत्ति के कारण गुणों या प्रतिष्ठा रखता है। भारत में अद्वितीय शिल्पों की एक समृद्ध परंपरा है।
वर्तमान संदर्भ: 27 जुलाई 2026 तक, भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री को पारंपरिक भारतीय शिल्पों के लिए जीआई टैग हेतु कई नए आवेदन प्राप्त हुए हैं। इनमें हिमाचल प्रदेश की जटिल लकड़ी की नक्काशी, ओडिशा की हाथ से बुनी रेशमी साड़ियाँ और राजस्थान की अनूठी मिट्टी के बर्तन शामिल हैं। आवेदन वर्तमान में समीक्षाधीन हैं।
प्रभाव: इन जीआई टैगों को प्रदान करने से इन शिल्पों की प्रामाणिकता की रक्षा होगी, नकल को रोका जा सकेगा, और उनके उत्पादों के बाजार मूल्य और पहचान को बढ़ाकर स्थानीय कारीगरों को सशक्त बनाया जा सकेगा। यह अद्वितीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में भी सहायता करता है।
राष्ट्रीय संग्रहालय ने प्राचीन पांडुलिपि संग्रह का डिजिटलीकरण किया
2026-07-27पृष्ठभूमि: नई दिल्ली में राष्ट्रीय संग्रहालय में कलाकृतियों और ऐतिहासिक दस्तावेजों का एक विशाल संग्रह है, जिसमें कई प्राचीन पांडुलिपियां शामिल हैं जो भारत के अतीत को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
वर्तमान संदर्भ: 26 जुलाई 2026 को, राष्ट्रीय संग्रहालय ने दुर्लभ और प्राचीन पांडुलिपियों के अपने संग्रह को डिजिटल बनाने की परियोजना के एक महत्वपूर्ण चरण के पूरा होने की घोषणा की। संस्कृति मंत्रालय द्वारा समर्थित इस पहल का उद्देश्य 5,000 से अधिक पांडुलिपियों की उच्च-रिज़ॉल्यूशन डिजिटल प्रतियां बनाना है, उन्हें क्षरण से बचाना और उन्हें दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए सुलभ बनाना है।
प्रभाव: डिजिटलीकरण नाजुक पांडुलिपियों के दीर्घकालिक संरक्षण को सुनिश्चित करता है, जिससे भौतिक क्षरण को रोका जा सके। यह ऐतिहासिक ज्ञान तक पहुंच को भी लोकतांत्रिक बनाता है, जिससे विद्वानों और जनता को इन अमूल्य ग्रंथों का ऑनलाइन अध्ययन करने की अनुमति मिलती है, जिससे अधिक शोध और सांस्कृतिक समझ को बढ़ावा मिलता है।