संस्कृति मंत्रालय अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 पर योग की कलात्मक विरासत को उजागर करेगा
2026-06-21पृष्ठभूमि: प्रतिवर्ष 21 जून को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस, योग की प्राचीन भारतीय प्रथा का सम्मान करता है, जिसे विश्व स्तर पर इसके स्वास्थ्य लाभों के लिए मान्यता प्राप्त है। भारत, योग की जन्मभूमि के रूप में, लगातार इसके गहन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आयामों को बढ़ावा देता है। वर्तमान संदर्भ: अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 2026 के लिए, संस्कृति मंत्रालय, आयुष मंत्रालय के सहयोग से, एक विशेष राष्ट्रव्यापी अभियान शुरू करने के लिए तैयार है। इस पहल का उद्देश्य प्रमुख सांस्कृतिक केंद्रों पर प्राचीन योग ग्रंथों की प्रदर्शनियों, आसनों को दर्शाने वाली पारंपरिक कला और योग सिद्धांतों से प्रेरित शास्त्रीय नृत्य प्रदर्शनों सहित विभिन्न सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से योग की कलात्मक और दार्शनिक विरासत को प्रदर्शित करना है। प्रभाव: इस अभियान का लक्ष्य योग की वैश्विक धारणा को शारीरिक व्यायाम से परे व्यापक बनाना है, जो भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में इसकी अभिन्न भूमिका पर जोर देता है। यह पारंपरिक भारतीय कलाओं के लिए गहरी प्रशंसा को बढ़ावा देगा, सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देगा, और भविष्य की पीढ़ियों के लिए योग की बहुआयामी विरासत के संरक्षण को प्रोत्साहित करेगा।
मालाबार हथकरघा बुनाई को मिला प्रतिष्ठित जीआई टैग, कारीगरों की आजीविका को बढ़ावा
2026-06-21पृष्ठभूमि: भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग महत्वपूर्ण बौद्धिक संपदा अधिकार हैं जो किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से उत्पन्न होने वाले उत्पादों की पहचान करते हैं, जिनमें उस मूल के कारण विशेष गुण या प्रतिष्ठा होती है। ये पारंपरिक शिल्पों की रक्षा और स्थानीय कारीगर समुदायों का समर्थन करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान संदर्भ: भारत सरकार ने जीआई रजिस्ट्री के माध्यम से केरल की 'मालाबार हथकरघा बुनाई' को आधिकारिक तौर पर प्रतिष्ठित भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग प्रदान किया है। यह मान्यता स्थानीय कारीगर सहकारी समितियों और राज्य के सांस्कृतिक विभाग द्वारा व्यापक दस्तावेज़ीकरण और वकालत के बाद मिली है, जो इसके अद्वितीय पैटर्न, प्राकृतिक रंगों और सदियों पुरानी बुनाई तकनीकों को स्वीकार करती है। प्रभाव: यह जीआई टैग अनाधिकृत नकल के खिलाफ कानूनी सुरक्षा प्रदान करेगा, जिससे मालाबार हथकरघा उत्पादों का बाजार मूल्य और वैश्विक पहचान काफी बढ़ जाएगी। इससे हजारों बुनकरों को सशक्त बनाने, स्थायी आजीविका सुनिश्चित करने और युवा पीढ़ी को इस समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा को जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करने की उम्मीद है, जिससे भारत की वस्त्र विरासत का एक अमूल्य हिस्सा संरक्षित होगा।